इस्लामाबाद:पाकिस्तान इन दिनों आर्थिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ गंभीर जल संकट से भी जूझ रहा है। देश के सबसे बड़े और संसाधन संपन्न प्रांत बलूचिस्तान में पानी की किल्लत ने हालात बेहद बिगाड़ दिए हैं। प्रांतीय राजधानी क्वेटा में पेयजल का अभाव इतना गहरा गया है कि यह अब दो प्रांतों के बीच बड़े राजनीतिक विवाद में बदल चुका है। बलूचिस्तान के नेताओं ने सिंध प्रांत पर उनके हिस्से का पानी रोकने का आरोप लगाया है, जिससे किसानों की फसलें चौपट हो रही हैं और आम जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है।

क्वेटा में नलों से पानी गायब, भूजल स्तर गिरा

क्वेटा में भूजल स्तर लगातार नीचे गिरने की वजह से स्थिति भयावह हो चुकी है। शहर के कई इलाकों में कुएं और बोरवेल पूरी तरह सूख गए हैं, वहीं सरकारी जलापूर्ति प्रणाली भी चरमरा गई है। सरिएब, सिरकी रोड, समुंगली रोड, जिन्ना टाउन, कंबरनी रोड और सैटेलाइट टाउन जैसे क्षेत्रों में महीनों से नलों में पानी नहीं आया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे नियमित रूप से पानी के बिलों का भुगतान कर रहे हैं, फिर भी उन्हें पानी के लिए दूर-दराज के इलाकों में भटकना पड़ रहा है।

1991 के जल समझौते को लेकर गरमाई राजनीति

पानी की कमी को लेकर अब सियासी जंग शुरू हो गई है। बलूचिस्तान सरकार के मंत्रियों और स्थानीय किसानों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया है। उनका कहना है कि वर्ष 1991 के जल बंटवारा समझौते के अनुसार, बलूचिस्तान को खिरथर नहर से 2,400 क्यूसेक और पट फीडर नहर से 6,700 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए। आरोप है कि सिंध सरकार तय मात्रा से बहुत कम पानी छोड़ रही है, जिससे सिंचाई व्यवस्था ठप हो गई है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

समाधान की कोशिशें और बढ़ता अंतरप्रांतीय तनाव

विवाद को सुलझाने के लिए बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जो सिंध सरकार से वार्ता करेगी। दूसरी तरफ, सिंध के सिंचाई विभाग का दावा है कि वे बलूचिस्तान को उसके तय कोटे से भी ज्यादा पानी दे रहे हैं, जिसे बलूचिस्तान सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। जल विशेषज्ञों की मानें तो पाकिस्तान पहले ही भीषण जल संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में अगर दोनों प्रांतों के बीच यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो यह आगे चलकर बड़े क्षेत्रीय तनाव और सामाजिक अस्थिरता का रूप ले सकता है।