समझौता बड़ा: निवेश और सुरक्षा दोनों शामिल, जानिए पूरी डील की बातें
वॉशिंगटन:अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी सैन्य और कूटनीतिक तनाव को खत्म करने के लिए तैयार हो रही संभावित डील अब अपने अंतिम चरण में पहुंचती दिख रही है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस बात की पुष्टि की है कि दोनों पक्ष एक बड़े समझौते के बेहद करीब हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि अंतिम सहमति बनने से पहले कुछ बेहद पेचीदा और संवेदनशील मुद्दों को सुलझाना अभी बाकी है। अगर यह अंतरराष्ट्रीय समझौता पूरी तरह अमलीजामा पहनता है, तो इसमें केवल युद्धविराम ही नहीं, बल्कि परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों में ढील, लेबनान संकट और ईरान के लिए एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय निवेश पैकेज भी शामिल होगा।
प्रस्तावित डील के मुख्य बिंदु: सीजफायर से लेकर अरबों डॉलर के निवेश तक
इस महा-समझौते के मसौदे में कई बड़े और ऐतिहासिक प्रावधान शामिल किए गए हैं, जो मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की तस्वीर बदल सकते हैं:
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60 दिनों का सीजफायर: दोनों देश सबसे पहले 60 दिनों के लिए युद्धविराम बढ़ाने पर सहमत होंगे, जिस दौरान स्थायी शांति और परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से बातचीत शुरू की जाएगी।
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होर्मुज जलमार्ग को खोलना: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से ईरान समुद्री बारूदी सुरंगें हटाएगा, ताकि जहाजों की आवाजाही सामान्य हो सके। बदले में अमेरिका अपने नौसैनिक प्रतिबंधों में ढील देगा।
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परमाणु कार्यक्रम पर कड़ा रुख: अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने की लिखित प्रतिबद्धता दे। इसमें ईरान के पास मौजूद समृद्ध यूरेनियम के भंडार और भविष्य में यूरेनियम संवर्धन (रिफाइनिंग) की सीमा तय करने पर भी बात होगी।
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फ्रीज संपत्तियों की बहाली: समझौते के तहत विदेशों में फंसी ईरान की अरबों डॉलर की जमे हुए फंड (संपत्तियों) को वापस दिलाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत देने पर भी चर्चा शामिल है।
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लेबनान संकट पर नियंत्रण: डील में लेबनान में जारी संघर्ष को रोकने और हिजबुल्ला व इजरायल के बीच जारी सीधे तनाव को कम करने का प्रावधान भी जोड़ा गया है।
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300 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश: इस डील का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा ईरान के लिए करीब 300 अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय निवेश और पुनर्निर्माण कार्यक्रम का प्रस्ताव है। समझौता फाइनल होने पर तेल, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) जैसे बड़े सेक्टर्स में अमेरिकी कंपनियों की ईरान में एंट्री हो सकती है।
पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता, लेकिन शर्तों पर अभी भी पेंच फंसा
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही इस गुप्त और महत्वपूर्ण बातचीत का अधिकांश हिस्सा पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता के जरिए मुमकिन हो पाया है। इसके बावजूद, कुछ बुनियादी शर्तों को लेकर दोनों देशों के बीच अभी भी गहरा मतभेद बना हुआ है। सबसे बड़ा विवाद सीजफायर की परिभाषा को लेकर है। अमेरिका का मानना है कि यह समझौता सिर्फ 60 दिनों के लिए लड़ाई रोकने और आगे की कूटनीतिक राह खोलने का एक जरिया है। इसके विपरीत, ईरान का दावा है कि इस समझौते का मतलब लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध की परमानेंट समाप्ति है।
समयसीमा और प्रतिबंध हटाने के तौर-तरीकों पर अलग-अलग राय
होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की प्रक्रिया को लेकर भी दोनों देश अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि ईरान पहले समुद्र से अपनी बारूदी सुरंगें पूरी तरह हटाए और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता दे, जिसके बाद अमेरिका चरणबद्ध (स्टेप-बाय-स्टेप) तरीके से प्रतिबंधों को हटाएगा। दूसरी तरफ, ईरान की मांग है कि समझौते पर दस्तखत होने के 30 दिनों के भीतर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी पूरी तरह खत्म हो जानी चाहिए और पूरी बातचीत के दौरान जलमार्ग खुला रहना चाहिए। इसके साथ ही, अमेरिकी अधिकारियों के लिए अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि ईरान की तरफ से इस मसौदे को अंतिम मंजूरी देने का मुख्य अधिकार असल में किसके पास है।

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