93 दिन, 250 किमी पीछा और आखिर ‘फाइनल जस्टिस’, ऑपरेशन महादेव की पूरी कहानी
ऑपरेशन महादेव: 93 दिनों का पीछा और पहाड़ियों में आतंकियों का काल बनी पैरा स्पेशल फोर्सेज
श्रीनगर। पिछले वर्ष 22 अप्रैल को पहलगाम के बायसरन में पर्यटकों पर हुए कायराना हमले की बरसी करीब है। उस खूनी मंजर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन आज एक साल बाद, भारतीय सेना के 'ऑपरेशन महादेव' की सफलता की कहानी गौरव के साथ याद की जा रही है। 93 दिनों तक चले इस कठिन मिशन में सेना ने 250 किलोमीटर तक पीछा कर मासूमों के हत्यारों को मिट्टी में मिला दिया।
कुलीन कमांडोज की मोर्चाबंदी
हमले के तुरंत बाद खुफिया तंत्र सक्रिय हुआ और लश्कर-ए-ताइबा के तीन खूंखार विदेशी आतंकियों—सुलेमान शाह, हमजा अफगानी और जिबरान भाई—की शिनाख्त की गई। ये आतंकी दक्षिण कश्मीर के अभेद्य जंगलों और त्राल की दुर्गम पहाड़ियों का सहारा लेकर छिपे हुए थे। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए सेना ने अपनी सबसे घातक इकाई, पैरा स्पेशल फोर्सेज (Para SF) को इस मिशन की कमान सौंपी।
ड्रोन और तकनीक का जाल
यह ऑपरेशन भारतीय सेना के अटूट धैर्य और आधुनिक तकनीक का बेजोड़ उदाहरण था। आतंकियों को खोजने के लिए:
- तकनीक: ड्रोन, रिमोटली पायलट एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर का इस्तेमाल किया गया।
- घेराबंदी: लिदवास से लेकर दाचीगाम तक लगभग 300 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र की नाकेबंदी की गई।
- दबाव: 10 जुलाई तक कमांडोज ने अपनी रणनीतिक कुशलता से आतंकियों को दाचीगाम के मात्र 25 वर्ग किलोमीटर के छोटे से दायरे में सिमटने पर मजबूर कर दिया।
सर्जिकल प्रहार: 28 जुलाई का निर्णायक क्षण
93 दिनों के लंबे इंतजार के बाद 28 जुलाई 2025 की रात इस मिशन का अंतिम चरण शुरू हुआ। पैरा कमांडोज की टीम ने बेहद कठिन चढ़ाई और घने अंधेरे के बीच 10 घंटों तक पैदल मार्च किया। आतंकियों के ठिकाने को चारों तरफ से घेर लिया गया और कुछ ही मिनटों की सटीक मुठभेड़ में तीनों आतंकियों को ढेर कर दिया गया।

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