कानून नहीं, आशीर्वाद से चलता है सिस्टम” — रीवा संभाग में राजनीति-पुलिस गठजोड़ की नई मिसाल
जनसमस्या नहीं, “मनपसंद कुर्सी” लेकर पहुँचे के. पूर साहब, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के घर हुई गुप्त भेंट
“किस थाने पर शासन करना है बताइए…” — कानून की किताबें अलमारी में, सिफ़ारिशें मेज़ पर
शिकायत पेटी से ज़्यादा असरदार बने ‘संपर्क सूत्र’, लोकतंत्र और संविधान रहे मूकदर्शक
रीवा।रीवा संभाग की राजनीति और पुलिस व्यवस्था के पवित्र गठजोड़ का एक और “शानदार” उदाहरण उस वक्त सामने आया, जब के. पूर साहब किसी जनसमस्या को लेकर नहीं, बल्कि अपने भविष्य की कुर्सी का नक्शा लेकर संभाग के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के घर पहुँच गए।सूत्रों के मुताबिक, अधिकारी महोदय ने कानून की मोटी-मोटी किताबें अलमारी में बंद करते हुए बड़े आत्मीय स्वर में कहा—“समस्या-वमस्या छोड़िए पुअर साहब, पहले यह बताइए कि किस थाने पर शासन करना है। मनचाहा थाना मिल जाएगा, बाकी सब अपने आप मैनेज हो जाएगा।”बताया जा रहा है कि इस ऐतिहासिक आश्वासन के बाद लोकतंत्र कुछ देर के लिए शर्म से पानी-पानी हो गया और संविधान ने चुपचाप करवट बदल ली। वहीं आम जनता अब यह सोचने को मजबूर है कि शिकायत पेटी में आवेदन डालना ज़्यादा बेहतर है या सीधे किसी “संपर्क सूत्र” की तलाश करना।गलियारों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में थानों के नाम बदलकर “जनप्रतिनिधि सुविधा केंद्र” रख दिए जाएँगे, जहाँ कानून नहीं बल्कि सिफ़ारिश की सुनवाई हुआ करेगी।वैसे भी के. पूर साहब को एक ही संभाग में नौकरी करना कुछ ज़्यादा ही भा गया है। भर्ती से लेकर निरीक्षक बनने तक का उनका सफ़र मनमाफ़िक जगहों पर ही तय हुआ है—काबिलियत से नहीं, बल्कि… आप जानते ही हैं, कैसे।

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